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श्रीखंड कैलाश यात्रा | Shrikhand Kailash Yatra - A Journey to Lord Shiva's Abode |

श्रीखंड कैलाश यात्रा
कुल्लू -हिमाचल प्रदेश 


श्रीखंड महादेव  कैलाश 

श्रीखंड महादेव  कैलाश  'महादेव' के उन स्थानों में से एक है जिन्हे हमारे वैदिक शास्त्रों में कैलाश( महादेव का निवास स्थान )  कहा गया है | पूर्ण रूप से महादेव शिव का निवास स्थान 'कैलाश पर्वत' जो तिब्बत में स्थित है को ही माना  जाता है | तथा इसके साथ ही महादेव शिव के प्रमुख चार  निवास और भी है जिन्हे उप कैलाश भी कहा जाता है जिनमे 'श्रीखंड कैलाश' हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में, 'मणिमहेश कैलाश' हिमाचल प्रदेश के चम्बा में, 'किन्नौर कैलाश' हिमाचल के किन्नौर में, तथा 'आदि कैलाश'  उत्तराखंड में तिब्बत व् नेपाल की सीमा पर जोंगलीकोंग में विराजमान है | इन पांचो कैलाशों को एक रूप में पंचकैलाश' भी कहते है |
श्रीखंड महादेव पर्वत हिमाचल के कुल्लू में  ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क से सटा है| श्रीखंड कैलाश की समुद्रतल से ऊंचाई लगभग 17200 फुट आंकी गयी है स्थानीय लोगो के अनुसार, इस चोटी पर भगवान् शिव का वास है | वैदिक दृष्टि से हिमालय  श्रृंखलाओं को  पुरे भारतवर्ष एवं विश्व के  कई अन्य देशो में  में बहुत पवित्र समझा  जाता है तथा इसके साथ ही इसमें कई ऐसे पर्वत एवं स्थान है जिन्हे भगवन शिव के चिन्ह स्वरुप उनकी पूजा की जाती है | भगवान् शिव को अधिकांश तौर पर शिवलिंग स्वरुप में ही पूजा जाता है   श्रीखंड कैलाश  उन पर्वतों में एक है जिसे लोग भगवन शिव के चिन्ह स्वरुप में उनकी पूजा करते है |
वैदिक शास्त्रों,पुराणों,  महाकाव्यों  या महाकथाओं में भोलेनाथ शिव को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है , भोलेनाथ शिवशंकर स्वयं ब्रह्मा एवं भगवान विष्णु त्रिदेवों में एक है | पुराणों में एक कथा है की स्वयं ब्रह्मा एवं भगवान विष्णु भी महादेव शंकर के आत्मलिंग का पार नहीं  पा सके थे |

Bhasmasur chasing Lord Shiva with Bhasma Kangan in his Hand

श्रीखंड कैलाश का महात्मय -
पवित्र स्थल श्रीखंड कैलाश की समुद्रतल से ऊंचाई लगभग 17200 फुट आंकी गयी है यह पवित्र स्थान हिमाचल के पर्वतों में बसा है |  श्रीखंड कैलाश में महादेव शिव को एक लिंग जैसी आकृति वाल पत्थर जिसका आकार लगभग 75  फुट ऊँचा और 45  फुट के घेराव में है  के रूप में पूजा जाता है | यह 75 फुट ऊँचा पाषाण लिंग 17200 फुट ऊँचे पर्वत पर स्वछंद विध्यमान है| इस लिंग में एक दरार है जो लिंग के मध्य भाग में तिरछी दिशा के संकेत के रूप में विराजमान है ,  इस दरार में श्रद्धालुओं द्वारा भेंटे अर्पण की जाती है   इस दरार में श्रद्धालुओं द्वारा अनगिनत भेंटे चढ़ाई गयी है  लेकिन यह चमत्कार माना गया है की यह दरार कभी भर्ती ही नहीं है |

एक जनश्रुति के अनुसार महा पंडित रावण महादेव के दर्शनों के लिए रोज श्रीखंड कैलाश आता था और भक्तिभाव से  अपना सिर भोले महादेव को भेंट स्वरुप अर्पण करता था | यही पर रावण ने महादेव के दर्शन किये थे | परिणामस्वरूप इस स्थान को सिर खंडन के नाम से अतीत में जाना जाता था , जो वर्तमान में श्रीखंड के नाम से अस्तित्व में आया |

श्रीखंड कैलाश भी कई पौराणिक कथाओं एवंम मान्यताओं में प्रचलित है | एक कथा के अनुसार - पौराणिक युग में भस्मासुर नामक  एक राक्षस ने भगवान् शिवशंकर की तपस्या कर उन्हें  प्रसन्न किया  और वरदान में भस्म कंगन प्राप्त किया की वो जिसके भी सर के ऊपर हाथ रखे वह भस्म हो जाये | राक्षस महान तपस्वी होने  साथ महान मूर्ख, जड़बुद्धि , पशु-आचरण के भी थे | कथा के अनुसार भस्मासुर राक्षस ने भगवान् शिव को भस्म कर माता पार्वती एवं कैलाश पर अधिपत्य का निर्णय ले लिया , भगवान् शिव उसकी इस मंशा को भांप गए और डेवढ़ांक  स्थान पर एक गुफा में अंतरध्यान हो गए | कहा जाता है की भगवान् शिव सूक्षम रूप में डेवढ़ांक से होते हुए श्रीखण्ड  पर्वत पर प्रकट हुए तथा एक विशाल पत्थर के रूप में समाधिस्थ हो गए |  भस्मासुर भगवान् शिव का पीछा करते हुए श्रीखंड तक  पहुँच गया ,यह  बात जब भगवान् विष्णु जी को पता चली तो भगवान्  विष्णु जी  ने मोहिनी रूप धर भस्मासुर के वध का निश्चय लिया और भस्मासुर को  नृत्य की लीला में मोहित कर उसे उसी के हाथो भस्म कर  दिया | इसके बाद इसी पर्वत पर माता पार्वती , गणेश जी व् कार्तिकेय जी ने घोर तपस्या की तब भगवान् शंकर पाषाण समाधी  को खंडित कर बहार आए |

डेवढ़ांक गुफा

डेवढ़ांक गुफा यात्रा का पहला पड़ाव है यही से यात्रा की शुरुवात होती है लोकमान्यताओं में कहा जाता है तथा शिव के भक्तों का भी यही दृढ़ विश्वास है की भस्मासुर राक्षस को भस्म कंगन का वरदान  देने के बाद  महादेव शिव इसी स्थान पर अंतर्ध्यान हो गए थे |


डेवढ़ांक गुफा के समीप बायल ग्राम 
श्रीखंड पर्वत का विवरण यूँ तो किसी ग्रन्थ या पुराणों में नहीं मिला है किन्तु श्रीखंड के आस- पास  स्थानों  सापेक्ष व् चिन्ह मिले है उस आधार पर इस स्थान के
श्रीखण्ड कैलाश के इतिहास को पांडवो  जोड़ा जाता है , कहा जाता है  हस्तिनापुर ( इद्रप्रस्थ ) से १४(14 ) वर्ष के वनवास के दौरान पांडवों को हिमालय की घाटियों व् पहाड़ों की कन्दराओं में समय गुजारना पड़ा था इसी दौरान माता कुंती भी पांडवों के साथ थी | वनवास के दौरान पांडवों ने अधिकतम समय हिमाचल तथा उत्तराखंड के पहाड़ों में व्यतीत किया इनमे  अधिकतम स्थानों पर पांडवों के सापेक्ष भी मिले है | पांडवों ने  हिमाचल में  बहुत स्थानों पर अपना समय गुजारा यहाँ पर कई स्थानों पर मंदिर भी स्थापित किये | इसी दौरान  श्रीखंड  कैलाश में महाराज युधिष्ठिर ने भीम व् माता कुंती सहित वनवास के कई वर्ष बिताये | इसके कुछ सापेक्ष  भीमबही (पाण्डुलिपि में भीम के शिला लेख ) के रूप  में   17000 फ़ीट ऊँचे पर्वत श्रीखंड कैलाश पर मिले है ,लोक मान्यताओं में कहा जाता है की पांडव भीम ने श्रीखंड कैलाश में एक स्थान पर ( जिसे अब भीमडवार भी कहते है) बकासुर नाम के एक राक्षस का वध किया था | बकासुर श्रीखंड कैलाश के बुग्यालों में चरवाहों की  भेड़ -बकरीओं व् अन्य पशुओं को खा जाता था जिस कारण उस राक्षस को बकासुर कहा जाता था, यहाँ के  गद्दी व् चरवाहों के पशु धन की रक्षा के लिए भीम ने यहाँ पर बकासुर राक्षस का वध किया इस  मिटटी का रंग आज भी लाल है |
श्रीखंड कैलाश भगवान् के भारतवर्ष के साथ विश्व के अन्य देशों में भी अनन्य भक्त है जो हर वर्ष महादेव के दर्शन व् कृपा हेतु पंचकैलाशो की यात्रा करते है


श्रीखंड कैलाश की वादियों में जाओं गांव से प्रवेश होता है 
पंच कैलाशों की इन यात्राओं में श्री खण्ड कैलाश की यात्रा को पूर्ण करना सबसे कठिन समझा जाता है | श्रीखण्ड कैलाश पर्वत श्रृंखला  मध्य हिमालय  की पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है | श्रीखंड कैलाश हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिला में  समुद्रतल से लगभग  17200 फ़ीट की ऊंचाई पर स्तिथ है | श्रीखंड कैलाश की यात्रा हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिला में जाओं ( निरमंड ) गावं से शुरू होती है, जाओं गांव तक शिमला - रामपुर  व् विभिन्न स्थानों से बस , कार अथवा जीप द्वारा  आसानी से पहुंचा जा सकता है | जाओं से श्रीखंड कैलाश की दूरी 26 किलोमीटर के लगभग है | होकर ब्राटिनाला होते हुए थाचडू -काली घाटी की भयंकर  चढ़ाई समाप्त करने के बाद मनो स्वर्ग से होते हुए भीमडवार  और भीमद्वार से पार्वती बाग़ होते हुए श्रीखंड की चोटी तक पहुँचती है | यात्रा के तीन पड़ाव है -  सिंहगाड-थाचड़ू और भीम डवार

सिंघगाड़ यात्रा का पहला पड़ाव है यंहा पर यात्रिओं का पंजीकरण करने  के बाद यात्रा आरम्भ होती है सिंघगाड़ में रहने -खाने की पर्याप्त व्यवस्था है 

जाँव से सिंहगाड़ 3 कि० मी० सिंहगाड़ से थाचड़ू 8 कि० मी० और थाचड़ू से भीम डवार 9 कि० मी० की दूरी पर है यात्रा के तीनो पडावो मे श्री खंड सेवा दल की ओर से यात्रियों की सेवा मे लंगर दिन रात चलाया जाता है भीम डवार से श्री खण्ड कैलाश दर्शन 7  कि० मी० की दूरी पर है तथा दर्शन उपरांत भीम डवार या थाचड़ू वापिस आना अनिवार्य होता है
यात्रा मे  सिंहगाड, थाचरू, कालीजोत  ,  भीमतलाई , ढंकद्वार ,  भीमडवारी,  बकासुर वध स्थली , पार्वती झरना , पार्वती बाग, नयनसरोवर व भीमबही आदि स्थान आते हैं। सिंहगाड यात्रा का बेस कैंप है। जहां से नाम दर्ज करने के बाद श्रद्धालुओं को यात्रा की अनुमति दी जाती है। श्रीखंडसेवा समिति की ओर से श्रद्धालुओं के लिए हर पडाव पर लंगर की व्यवस्था होतीहै।


 ( जाओं व् बराटिनाला के मध्य)
नदी, नालो, झरनो, हरी-भरी घाटियों व् पर्वतों की यह अद्भुत यात्रा सिंघगाड़ से शुरू हो जाती है | सिंघगाड़ से थाचडू की दुरी लगभग 8 किमी. है जिसमे 2 किमी. की दुरी सीधी है जो बराटीनाला के अंत में जा कर ख़त्म होती है बराटीनाला में दो छोटी नदियों ( कुरपन व् बराटी  ) का संगम है यह दोनों नाले श्रीखंड की चोटियों से हे उत्पन्न होते है |

ब्रटिनाला में इन्ही साधु द्वारा लंगर चलाया जाता है 

सिंघगाड़ से ट्रेक शुरू होने के बाद बराटिनाला के साथ-साथ जंगल के मध्य से होकर निकलता है श्रीखंड कैलाश यात्रा शुरुवात से ही यात्रियों के तन-मन को इतना आनंदित कर देती है की यात्री हर-हर महादेव , जय श्रीखंड महादेव, बम-बम भोले  के उद्घोष के साथ कैलाश में महद्व के दर्शन के लिए चल निकलते है | बराटीनाला के जंगल में साधु-संतो द्वारा व् अन्य महादेव के भक्तों के द्वारा भण्डारे एवं चाय-मिष्ठान की व्यवस्था होती है यात्रा के दौरान कोई भी इन भण्डारो से प्रशाद ग्रहण किये नहीं रहता | 
डण्डीधार के जंगल से गुजरते हुए भोले के भक्त 

(बराटीनाला  से थाचडू से  कालीघाटी  ) श्रीखण्ड कैलाश की पहली चढ़ाई शरू होती है, कालीघाटी तक की   इस चढ़ाई को  कैलाश यात्रा की सबसे कठिन व् सबसे महत्वपूर्ण चढ़ाई माना  जाता  है , इस प्रथम चढ़ाई में कैलाश यात्रियों की कड़ी परीक्षा हो जाती है यह सीधी  चढ़ाई ब्राटिनाला से शुरू होती है जिसे डण्डीधार के नाम से जाना जाता है इस कठिन  चढ़ाई को पार करने के लिए यात्री डंडे का सहारा लेते जिस कारण इसे  डण्डीधार कहा जाता है | इस चढ़ाई में आपको कैलाश यात्रा व् कैलाश की जलवायु के अनुकूल अभ्यस्त होने के लिए तैयार होना होता है  डण्डीधार से थाचडू के ट्रेक  को धीरे-धीरे चल कर पार किया जाना चाहिए इस बीच में आपको विश्राम करने टेंट्स  तथा जलपान के लिए कई स्थान मिल जायेंगे जो यहाँ के समीप गावं के लोगो द्वारा यात्रा के दौरान रोजगार के उद्देश्य से लगाए जाते है | यदि आप पहाड़ों में चलने के आदि है  तो आप कालीघाटी टॉप आसानी से पहुँच सकते है  आपको थाचडू में विश्राम करना चाहिए , थाचडू में श्रीखंड सेवा समिति द्वारा यात्रियों के लिए पड़ाव बनाया गया है जहाँ पर  यात्रिओं की सुविधा के लिए मेडिकल व् पुलिस की टीम  मौजूद रहती है यात्रियों के लिए यहाँ पर भंडारे की भी व्यवस्था होती है रात्रि विश्राम  के लिए यात्री यहाँ पर  स्थानीय लोगो द्वारा लगाए टेंटो में किराये पर रहते है जो रहने के साथ खाने का भी प्रबंध करते है जिसके आपको पैसे देने होते होते है स्थानीय लोगो द्वारा किये  यह प्रबंध आपको पूरी यात्रा के दौरान जगह-जगह पर मिल जायेंगे |
कई यात्री जो पहाड़ों की यात्राओं के अभ्यस्त नहीं होते या शारीरिक व् मानसिक अस्वस्था के कारण  कैलाश यात्रा के पहले चरण में ही  हार मान जाते है और यात्रा को पूरा नहीं कर पाते, वह यात्री थाचडू या कालीघाटी से श्रीखंड कैलाश के दर्शन कर लौट जाते है | यह यात्रा कई बार यात्री की लिए इतनी कठिन हो जाती है जिससे कई यात्री श्रीखंड कैलाश यात्रा के दौरान जीवन से हाथ धो बैठते है |

डण्डीधार के चढ़ाई को पूरा करने के बाद यात्री थाचडू पहुँचते  है यंहा से  श्रीखंड कैलाश की अप्रतीम नज़ारा पेश करने वाली वादियों में प्रवेश करते है 
थाचडू से श्रीखंड कैलाश के अद्भुत दर्शन 

थाचडू से निकलने के बाद वृक्ष रेखा समाप्त हो जाती है  यात्री 10000 फुट की ऊंचाई को पार कर कैलाश की हरी-भरी घाटियों में पहुँचते है यह घाटियां इन दिनों विभिन्न प्रकार की जड़ी - बूटियों व् फूलों से भरी रहती है  

थाचडू के बाद कालीघाटी के लिए चढ़ाई चढ़ते यात्री 

भेड़-बकरी को चराने वालो द्वारा लगाए गए तिरपाल टेंट्स , जून से अगस्त तक घाटी में  हरी भरी घास की भरमार रहती है - भेड़ - बकरी चराने वालो के लिए यह समय अपने पशु धन को भरपूर आहार देने का होता है लिहाज़ा वो इन घाटियों में  मवेशियों को चराने के लिए लाते है औ और लगभग 3-4 महीने तक यहीं रहते है | 

कालीघाटी में भेड़ -बकरियों के साथ एक चरवाहा
कालीघाटी पहुँचने के बाद प्रकृति की पवित्रता व् सुंदरता महसूस होने लगती है कालीघाटी की ऊंचाई लगभग 3200 मीटर के  करीब है कालीघाटी से भीम द्वार तक कैलाश घाटी  इन दिनों पूरी तरह से सूंदर फूलो और तरह-तरह की जड़ी -बूटियों से भरी रहती है

कालीघाटी के टॉप एक बहुत ही पवित्र व् सूंदर स्थल है कालीघाटी से श्रीखंड कैलाश के दर्शन  है काली घाटी स्थल माता काली को समर्पित है  काली घाटी में भक्तों द्वारा कई बार शिव महापुराण यज्ञ का आयोजन भी किया जाता है | 
कालीघाटी के बाद भीम तलाई के पास से गुजरते यात्री 
कालीघाटी से भीम द्वार श्रीखंड कैलाश का दूसरा पड़ाव शुरू होता है कालीघाटी के बाद ट्रेक कभी नीचे कभी ऊपर बदलता रहता है कालीघाटी के बाद ऐसा प्रतीत होता है जैसे प्रकृति की दूसरी परत में प्रवेश हो रहा हो |  डण्डीधार की चढ़ाई में कुदरती पानी का कोई निशान नहीं मिलता किन्तु कालीघाटी के के बाद प्राकृतिक पानी के चश्मों की भरमार है यात्रियों में ऐसी मान्यता है की जो भी इन  वादियों का पानी पि लेता है वो जिंदगी  भर के लिए स्वस्थ हो जाता है क्योंकि कैलाश  के पानी में विभिन्न प्रकार की जड़ी-बूटियों से मिश्रित होता है | कालीघाटी उतरने के बाद भीम तलाई नमक स्थल आता है भीम  तलाई में काली कुंड नमक एक पवित्र स्थल है जनश्रुति के अनुसार पांडव भीम ने यंहा यह कुंड माता कुंती के लिए बनाया था|  लोक मान्यताओं के अनुसार, अज्ञातवास के दौरान  काली कुंड स्थल पर पांडवों की माता  तथा युधिष्ठिर ने तपस्या की थी माता कुंती इसी कुंड से जल लेती थी तथा वियोग का अर्पण करती थी|  ऐसा माना जाता है की काली कुंड से भीम द्वार तथा श्रीखंड कैलाश तक पांडवों ने अपना रास्ता तैयार किया था जिसे पांडव गोसर भी कहा जाता है इस आस्था व् प्रमाण से यह पुष्टि होती है की पांडव इस पवित्र स्थल की यात्रा के दौरान कुछ  समय के लिए उनका निवास स्थान यंहा रहा हो

भीम तलाई एक बहुत सूंदर स्थल है कई यात्री अपना पहला पड़ाव यंहा तक पूरा करते है यंहा पर स्थानीय लोगो द्वारा टेंट्स व् खाने -पिने का पूरा इंतज़ाम होता है 

भीम तलाई से भीम द्वार तक पहुँचने के लिए कभी आपको कभी चढ़ाई तो कभी ढलान में चलना होगा 

श्रीखंड कैलाश  की वादियों में विभिन्न प्रकार के फूल व् जड़ी-बूटियां 

भीम तलाई से चलने के बाद आप कुंशा नामक स्थल पर पहुंचोगे | कुंशा घाटी पूरी तरह से हरी-भरी घास व् विभिन्न प्रकार के फूलों से घिरी  रहती है | कुंशा घाटी में रहने व् खाने की उचित व्यवस्था  है  

कुंशा घाटी भेड़ -बकरी को चरने के लिए उचित स्थान यंहा गद्दियों द्वारा पत्थरों की एक हट  बनायीं गयी है जो बारिश में व् रात में मवेशियों व् चरवाहों की रक्षा करती है  

कुंशा घाटी से गुजरता एक कैलाश यात्री 



कैलाश घाटी में जितना  आगे बढ़ते जाते है घाटी उतने ही आकर्षक नज़ारे पेश करती है 
श्रीखंड कैलाश की वादियों से निकलती विभिन्न जल धाराएं 

(  भीम द्वार के समीप यात्री )यात्रा के दौरान घाटी कई बार धुंद से ढक  जाती है 

भीमडवार पड़ाव 
भीमडवार एक खुली घाटी है भीमडवार में ही पांडव भीम का निवास स्थान माना जाता था इसी स्थान पर भीम ने महादेव की तपस्या की थी भीमडवार में भीम  एक बड़ी सी शिला के निचे रहते थे जिसे यंहा की स्थानिय भाषा में ड्वार  कहते है | डवार - एक बड़े पत्थर के निचे कमरा नुमा खोल होता है जिसमे पहाड़ों में     प्राकृतिक सरायं के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है| 

(बकासुर वध स्थली) मान्यता है की इसी स्थान पर पाण्डु भीम ने बकासुर  नामक राक्षस का वध किया था इसी कारण इस स्थान पर मिटटी का रंग आज भी लाल है | 

स्थानीय लोगो द्वारा यात्रा का समय रोजगार का समय होता है इन लोगो द्वारा  हर पड़ाव पर रहने व् खाने की व्यवस्था की जाती है 

यात्रा के दौरान श्रीखंड सेवा समिति द्वारा यात्रा के महत्वपूर्ण तीन पड़ाव बनाये गए है जिसमे पहला सिंघगाड़ दूसरा थाचडू तथा तीसरा भीमद्वार | भीमडवार  में श्रीखंड सेवा समिति द्वारा रहने व् खाने  तथा मेडिकल टीम की व्यवस्था होती है लेकिन यह व्यवस्था यात्रियों की बहुतायत को देखते पूर्ण नहीं  हो पाती  इसलिए  यात्रिओं की सुविधा के लिए यात्रा के विभिन्न स्थलों पर स्थानीय लोगो द्वारा रहने -खाने की व्यवस्था भी की जाती है परन्तु इसका शुल्क देना अनिवार्य होता है यह शुल्क लगभग 200 -300 रु के लगभग होता है | यात्रा के विभिन्न पड़ावों तक इन सभी सुविधाओं को पहुँचाना एक बेहद मेहनत वाला तथा महंगा कार्य है भीमडवार या पार्वती बाग़ तक यह सामान 70 -80 रू प्रति किलो पहुँचता है  |  इन सभी स्थानों पर आपको यह सभी चीजे थोड़ी ऊँचे दामों पर मिल  सकती है पर कैलाश की घाटियों में इन सुविधाओं का मिलना भी एक सेवा के समान  है | भीमडवार यात्रा का अंतिम पड़ाव है भीमडवार  श्रीखंड कैलाश की दुरी  3 -4किमी के लगभग है


भीमडवार में स्थानीय लोग टेंट व् खाने की उचित व्यवस्था करते है  
भीमडवार में रात्रि विश्राम करना अब अनिवार्य है | यात्रा के पिछले वर्षों में अंतिम पड़ाव पार्वती बाग़ होता था किन्तु हर साल  यात्रिओ की संख्या बढ़ने के कारण पार्वती बाग़ की पवित्रता ख़तम होने लगी यंहा उगने वाले पवित्र ब्रह्मकमल व् अन्य दुर्लभ जड़ी-बूटियां जो केवल इस ऊंचाई पर ही पायी जा सकती है कम    मात्रा में उगने लगे  | पवित्र पार्वती बाग़ की सुंदतरता को बचाये रखने के लिए अब पार्वती बाग़ के पड़ाव को भीमडवार  तक ही सीमित रखा गया  है भीमडवार के बाद पार्वती बाग़ में किसी यात्री को रुकने की अनुमति नहीं है  केवल मेडिकल व् रेस्क्यू टीमें ही उपलब्ध रहती है |

 भीमडवार से सुबह 5 बजे कैलाश  में महादेव के दर्शनों के लिए तैयार 
यात्रा का अंतिम चरण भीमडवार से पार्वती बाग़ से नयनसरोवर से भीमबही से श्रीखंड कैलाश महादेव के दर्शन  करना है | भीमडवार से श्रीखंड कैलाश की दुरी ३-४ किमि.के लगभग है इस स्थल से यात्रा की शुरुवात सुबह जल्दी करनी होती है इसके बाद आपको रुकने की मनाही है आपको कैलाश महादेव के दर्शन कर वापिस पड़ाव पर आना होता है | सुबह के समय पहाड़ों की सूंदर छठा देखते ही बनती है | सुबह -सुबह यात्रा शुरू करने से स्फूर्ति आती है व् मन भी पवित्र आता है यात्री महादेव , भोले बाबा , जय शंकर , हर-हर महादेव के आगाज़ के साथ कैलाश की और बढ़ते जाते है भीमडवार से थोड़ी दूर चलने के बाद पवित्र पार्वती झरने के दर्शन होते है इसके साथ ही आप पवित्र पार्वती बाग़ में प्रवेश करते है |
पार्वतीबाग से भीमडवार का नज़ारा 

पवित्र पार्वती झरना





पार्वती बाग़ 
भीमडवार से पार्वती बाग़ की दुरी करीब 2 किमी. यह यात्रा का अंतिम स्थल है जंहा यात्रिओं की सुविधा के लिए मेडिकल, रेस्क्यू एवं चाय-पानी की व्यवस्था होती है | श्रीखंड कैलाश  की यात्रा महादेव की सभी यात्राओं में सबसे कठिन मानी जाती है | इस यात्रा के लिए स्वयं को शारीरिक व् मानसिक तौर पर स्वस्थ व् दृढ़  होना आवश्यक है पार्वती बाग़ से कैलाश की और बढ़ने पर ऊंचाई लगभग 15000 फुट के पार होती है यंहा से आगे एक निर्जन इलाके की शुरुवात होती है कोई भी पेड़-पौधा नहीं हे केवल अति पवित्र जड़ी-बूटियां जैसे ब्रह्मकमल ही पाया जाता है अब रस्ते में केवल पत्थर व्   बर्फ ही मिलतेहै  जिस कारण ऑक्सीजन की उपलब्धता काम होने लगती है|  आगे ऑक्सीजन की कमी के कारण चलने में मुश्किल आने लगती है इसलिए छोटे कदम  धीरे -धीरे आगे की यात्रा को पूरा करना चाहिए | 
पार्वती बाग़ 

पार्वती बाग़ में माता का स्थान 
पार्वती बाग़ माता पार्वती को समर्पित है मान्यताओं के अनुसार इस पवित्र स्थल पर माता पार्वती ने भगवान् शिव की कठोर  तपस्या की थी पारवती बाग़ से थोड़ी चलने के बाद नयनसरोवर है कहा जाता है की माता पार्वती की कठोर तपस्या के कारण उनके नैनो से अश्रु गिरने के कारण ही इस सरोवर का निर्माण हुआ था | पार्वती बाग़ में माता की पूजा करने के बाद यात्री हर-हर महादेव के जयकारो के  कैलाश की ओर बढ़ते जाते है 
यह श्रीखंड पर्वत श्रृंखला है पार्वती बाग़ से नयनसरोवर को पार करने के बाद इसी पर्वत श्रृंखला में दाएं से बाएं की और आना पड़ता है आपको इस चित्र के बाये में श्रीखंड महादेव की शिला दिखेगी 

पार्वती बाग़ से नयनसरोवर की और बढ़ते यात्री 

नयनसरोवर व्  पार्वती बाग़ के मध्य यात्री 
पार्वती बाग़ के बाद पहाड़ों में हरी -भरी घास ख़त्म हो जाती है इसके बाद केवल पथरीला रास्ता रह जाता है पारवती बाग़ से नयनसरोवर की दुरी 2 किमी. लगभग  है | श्रीखंड कैलाश यात्रा महादेव के अनन्य भक्तों , पहाड़ों में ट्रैकिंग का आनन्द लेने वालो में जितनी लोकप्रिय है साधु-संतों को भी उतनी ही प्रिय है हर साल सैंकड़ो साधु महादेव के दर्शन हेतु श्रीखंड कैलाश पहुँचते है 

श्रीखंड कैलाश के मार्ग में विभिन्न साधु-संत 

नयनसरोवर की चढ़ाई चढ़ता यात्रियों का एक ग्रुप 
हर -हर महादेव , बम भोले , ॐ नमः शिवाय के जाप इस यात्रा को आसान बनाते है 
नयन सरोवर श्रीखंड कैलाश (लगभग 16000 फुट )
सूर्य देव की पहली किरण के साथ ही यात्री नयन सरोवर पहुँचते है | मान्यता अनुसार माता पार्वती  के नयन से गिरे अश्रु के कारन निर्मित हुई ये झील बहुत ही पवित्र समझी जाती है | यह बर्फीली  झील  कैलाश में लगभग 16000 फुट की ऊंचाई पर स्तिथ है तथा लगभग पुरे वर्ष बर्फ से ढकी रहती है | यात्री नयन सरोवर पहुंचकर सरोवर के जल से अपने तन-मन को पवित्र कर एवं सरोवर के पवित्र जल को साथ लेकर महादेव के अभिषेक हेतु कैलाश की और बढ़ते है | 

श्रीखंड कैलाश हर वर्ष हज़ारों यात्री आते है उनमे से कुछ ऐसे भी भक्त होते है जो बहुत ही दृढ़ इच्छा वाले होते है जो नंगे  पैर ही कैलाश की  करते है 
नयन सरोवर से श्रीखंड कैलाश की यात्रा कठिन व् लगातार चढ़ाई वाली है यह दुरी 2-3 किमी. के लगभग है ,  नयन सरोवर के बाद कैलाश के लिए रास्ता कठिन होता जाता है  केवल बहुत ज्यादा बर्फ और बड़े-बड़े पत्थर ही दिखाई पड़ते है  नयन सरोवर के बाद ऑक्सीजन की कमी होना शुरू हो जाती है सांस फूलने लगती है , और शरीर जवाब देने लगता है कहते है श्री खंड कैलाशकी यात्रा शरीर का खंड-खंड कर देने वाली यात्रा है, महादेव  इस यात्रा में भक्तों की कड़ी परीक्षा लेते है | श्रीखंड कैलाश की यात्रा इतनी कठिन है की कई बार या  लगभग हर वर्ष श्रीखंड कैलाश यात्रा के दौरान कुछ यात्री अपनी जान से हाट धो बैठते है | श्रीखंड कैलाश की यात्रा में हमेशा  शारीरिक व् मानसिक संतुलन बनाये रखना होता है | 


 नयन  सरोवर से कैलाश की और बढ़ते यात्री
 श्रीखंड  कैलाश की और बढ़ते यात्री 


नयन सरोवर के बाद श्रीखंड कैलाश की दुरी को धीरे-धीरे चल कर एवं विश्राम करते  हुए पार करना होता है 

( महादेव का झंडा लिए कैलाश यात्री ) कैलाश में यात्री सबकुछ भूल कर केवल महादेव के बारे में सोचता है वो महादेव के  नाम का जाप करता केवल कैलाश की और बढ़ता जाता है 

श्रीखंड कैलाश में भक्तों का एक टोला 

नयन सरोवर की चढ़ाई पार करने के बाद आप पर्वत श्रृंखला के शिखर पर होते है यंहा से नज़ारा अप्रतिम है दूर तक केवल पर्वत श्रृंखलाएं ही नजर आती है 

श्रीखंड पर्वत श्रृंखला में कैलाश की की  अग्रसर यात्री 

श्रीखंड कैलाश से किन्नेर कैलाश पर्वत माला एवं पिरामिड चोटी , पार्वती चोटी  का नज़ारा 

भीम बही के लिए सीधी खड़ी चढ़ाई पार करते यात्री 
भीम बही स्थल से किन्नेर कैलाश पर्वत माला का नज़ारा लेता एक भक्त 

श्रीखंड  कैलाश से हिमालयी पर्वतों का नज़ारा 
भीमबही स्थल समुद्रतल से लगभग 16500 फुट की ऊंचाई पर स्थित है यंहा पर आपको विशाल आयताकार गड़े हुए पत्थर मिलेंगे जिसे किसी प्राचीन लिपि में तराशा गया है जिसे पाण्डु लिपि का नाम भी दिया जाता है  यह स्थल महायोद्धा भीम के नाम से जाना जाता है इस स्थान पर पाण्डु भीम द्वारा तराशे गए विशालकाय आयताकार पत्थर पाये जाते है जो भीम का एक भोजा माना गया है | बही शब्द तात्पर्य यंहा भोजा से है इन विशाल पत्थरों में पाण्डुलिपि के प्रतीक मिलते है पत्थरों की परत  थाली के आकर की तरह बड़ाई गयी है इन विशाल व् भरी पत्थरों को  स्थान पर लाना व् तराशना  केवल महाबली पाण्डु भीम का ही कार्य माना जा सकता है  | किवदंतियों के अनुसार  जाता है की भीम यंहा से स्वर्ग के लिए सीढ़ियों का निर्माण करना चाहते थे लेकिन समय की बाधा के कारण पूरा नहीं कर पाए थे 

भीम बही  स्थल 
श्रीखंड कैलाश के समीप 


भीम बही स्थल को पार करने के बाद एक बेहद सूंदर दृश्य सामने होता है श्रीखंड महादेव आपके सामने होते है | यात्री इस कठिन यात्रा की सारी तकलीफे भूल श्रीखंड कैलाश के नतमस्तक हो जाते है  की सुंदरता अद्भुत व् अकल्पनीय है |  श्रीखंड कैलाश से हिमालय पर्वतों का अप्रतिम नज़ारा देखने को मिलता है 
एक ओर किन्नेर-  कैलाश  पर्वतों का नज़ारा तथा दूसरी और सराहन-शिमला के पहाड़ों का नज़ारा भी देखने को मिलता है | यंहा पर महादेव को शिला रूप में पूजा जाता है , इस  शिला रुपी शिवलिंग की ऊंचाई लगभग ७२ फुट है , महादेव के साथ यंहा माता पार्वती , गणेश भगवान व् कार्तिकेय महाराज भी शिला रूप में विध्यमान है | श्रीखंड कैलाश पहुँच कर नयन सरोवर से लाये जल से महादेव का अभिषेक करते है |इस स्थान   पर पूर्ण रूप से महादेव का राज्य चलता है महादेव कैलाश के राजा है हर वर्ष महादेव दर्शन के अभिलाषी श्रीखं कैलाश पहुँचते है | श्रीखंड कैलाश यात्रा एक रूहानी एहसास है जो  एक बार कैलाश की यात्रा कर लेता है वो जीवन भर महादेव का कृपापात्र बन जाता है | 


श्रीखंड कैलाश महादेव ( 17200 फुट ) 
श्रीखंड कैलाश यात्रा को हर वर्ष  हज़ारो श्रद्धालु महादेव के दर्शन के लिए आते है, श्रीखंड कैलाश यात्रा को सभी कैलाश यात्राओं में से सबसे कठिन माना जाता है  इसलिए इस यात्रा को सुचारू रूप से चलाने के लिए श्रीखंड सेवा समिति का  निर्माण किया गया है | श्रीखंड महादेव की यात्रा हर वर्ष जुलाई माह में की जाती है, आधिकारिक तौर पर यह सावन के प्रथम सोमवार को महादेव की छड़ी को कैलाश के लिए रवाना कर शुरू होती है | यह यात्रा लगभग 2-3 सप्ताह तक चलती है  यात्रा को सुचारू रूप से पूरा करने के लिए श्रीखंड समिति द्वारा यात्रा के दौरान  विभिन्न पड़ावों का निर्माण किया जाता है जिसमे   सिंघगाड़ - थाचडू -भीमडवार महत्वपूर्ण स्थान है | इन सभी स्थानों पर समिति द्वारा रहने-खाने, मेडिकल, व् अन्य सुविधाओं की व्यवस्था मुहैया करवाई जाती है  सिंघगाड़ यात्रा का महत्वपूर्ण व्  प्रथम पड़ाव है  आधिकारिक तौर पर यात्रा की शुरुवात सिंघ्गढ़ से ही होती है यंहा पर यात्रियों का पंजीकरण एवं मेडिकल जांच की जाती है व्  यात्रा के अन्य महत्वपूर्ण नियम बताये जाते है  यात्रा पर जाने से पहले शारीरिक व् मानसिक तौर पर स्वस्थ  होना अनिवार्य है |

 हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी देश की सबसे कठिन धार्मिक यात्राओं मैं से एक श्रीखंड महादेव जी की यात्रा आधिकारिक रूप से जुलाई 2018 तक आयोजित किया जायेगा।जुलाई महीने के पहले सप्ताह में श्रीखंड कैलाश  के रास्तों को इन रेस्क्यू टीम द्वारा जांचा जाएगा यात्रा को शुरू करने से पहले एक विशेष टीम श्रीखंड रवाना होगी जो पुरे मार्ग का आकलन करेगी और इसकी पुख्ता जानकारी प्रशाशन को दिया जायेगा।
महत्वपूर्ण बातें
श्रीखंड महादेव जी की यात्रा एक कठिन यात्रा है। ऐसे मैं आपको मह्त्वपूर्ण बातो का ध्यान रखना होगा जिससे आपको यात्रा मैं कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ेगा।
यात्रा के समय महत्वपूर्ण बातों को ध्यान में रखें: – यात्रा के समय प्रकृति का सम्मान करे , यात्रा के समय गंदगी न फैलाये , लकड़ियों का न जलाये ,ना ही ज़ोर से गाने बजाये, पेड़ पौधों या जड़ी-बूटियों को न तोड़े , या वन्यजीव को परेशान ना करे। अपने साथ अपने सभी कूड़े वापस ले जाये। शौचालय के नियमो का पालन करे। 
हमेशा स्थानीय भावनाओं, संस्कृति और प्रथाओं का सम्मान करें हिमाचल में इन दूरदराज के समुदायों के लोग बहुत गर्मजोशीपूर्ण और मेहमाननवाज हैं। उनके विश्वास को न तोड़े। कोई अच्छी मार्गदर्शिका आपको स्थानीय रीति-रिवाजों और प्रतिबंधों के बारे में बताएगा , जिनका सम्मान किया जाना चाहिए।
इस यात्रा को हल्के से न लें या इसके लिए तैयारी ठीक से करे। उपयुक्त शिविर के सामग्री,भोजन सामग्री, कपड़े, दवाइयां, जूते, टोर्च आदि से अपने आपको सुसज्जित रखे।
आपको हमेशा मौसम देखना चाहिए यह उच्च ऊंचाई पर अचानक बदल सकता है, तो अपने कार्यक्रम को संशोधित करने के लिए तैयार रहें। इन क्षेत्रों में प्रकृति राजा है, और आपको इसके आदेशों का पालन करना चाहिए।
श्रीखंड महादेव कैलाश पहुचंने के लिए विभिन्न स्थानों से दूरी
श्रीखंड महादेव पहुंचने के लिए शिमला जिला के रामपुर से कुल्लू जिला के निरमंड होकर बागीपुल और जाओं तक गाड़ियों और बसों में पहुंचना पड़ता है। जहां से आगे करीब  26  किलोमीटर की दूरी पैदल तय करनी होती है।
शिमला से रामपुर – 130 किमी
रामपुर से निरमंड – 17 किलोमीटर
निरमंड से बागीपुल – 17 किलोमीटर
बागीपुल से जाओं – करीब 12 किलोमीटर


                    जय श्रीखंड कैलाश                        जय हिमालय                       जय महादेव 
 


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